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चौपटा में ग्वार विशेषज्ञ डॉ. बी.डी. यादव ने बताया फसल में उखेड़ा रोग का रामबाण इलाज, आप भी जाने

 
सिरसा के नाथूसरी चौपटा के रामपुरा ढिल्लों गांव में ग्वार जागरूकता शिविर में किसानों को खेती की जानकारी देते विशेषज्ञ।

नाथूसरी चौपटा (सिरसा)। सिरसा जिले के नाथूसरी चौपटा खंड के गांव रामपुरा ढिल्लों में कृषि विभाग की ओर से ग्वार की खेती पर एक विशेष जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर का मुख्य मकसद किसानों को ग्वार बोने के फायदे और खेत की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने के तरीके बताना था। एटीएम (ATM) डॉ. मदन सिंह की देखरेख में हुए इस कार्यक्रम में हिसार कृषि विश्वविद्यालय के रिटायर्ड ग्वार विशेषज्ञ डॉ. बी.डी. यादव ने किसानों को कई जरूरी जानकारियां दीं। मौके पर मौजूद 78 किसानों को मुफ्त दवाइयां और बचाव किट भी बांटी गई।

डॉ. बी.डी. यादव ने किसानों को बताया कि जो किसान हर साल एक ही खेत में लगातार बी.टी. नरमा (कपास) बोते हैं, उनके खेतों की मिट्टी कमजोर हो जाती है और उसमें पोषक तत्वों की भारी कमी आ जाती है। जमीन की सेहत सुधारने के लिए फसल चक्र में ग्वार को जरूर शामिल करना चाहिए। कृषि शोध में यह साबित हो चुका है कि जिस खेत में ग्वार बोया जाता है, वहां अगली गेहूं या सरसों की फसल में 20 से 25 प्रतिशत यूरिया (नत्रजन) की बचत होती है और पैदावार भी ज्यादा मिलती है।

उखेड़ा (जड़ गलन) रोग से बचने का सही तरीका

ग्वार की फसल में सबसे ज्यादा नुकसान 'उखेड़ा' रोग से होता है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि इसका एकमात्र ठोस इलाज बिजाई से पहले 'बीज उपचार' करना है। इसके लिए कृषि विभाग ने यह तरीका सुझाया है:

  • प्रति किलो ग्वार के बीज के लिए 3 ग्राम वेबिस्टिन (Bavistin) दवा लें।
  • बीज और दवा को अच्छी तरह से सूखा मिला लें।
  • इसे 15 से 20 मिनट तक ऐसे ही रखा रहने दें और उसके बाद खेत में बिजाई करें।
  • इस प्रक्रिया से जड़ गलन की बीमारी पर 85 से 95 प्रतिशत तक काबू पाया जा सकता है।

हल्की जमीन और कम पानी के लिए ग्वार की किस्में

रामपुरा ढिल्लों इलाके में पानी की कमी और हल्की जमीन को देखते हुए किसानों को ग्वार की उन्नत 'एचजी 365' और 'एचजी 563' किस्में बोने की सलाह दी गई। ये किस्में 85 से 100 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं, जिससे अगली फसल सही समय पर बोई जा सकती है। जिन किसानों के पास नहर का पानी है, वे जून के पहले पखवाड़े में पानी लगाकर बिजाई कर सकते हैं। बारिश पर आधारित खेती के लिए जून का दूसरा पखवाड़ा या अच्छी बारिश के बाद का समय सबसे उपयुक्त माना गया है।

सिरसा के नाथूसरी चौपटा के रामपुरा ढिल्लों गांव में ग्वार जागरूकता शिविर में किसानों को खेती की जानकारी देते विशेषज्ञ।

खाद का प्रयोग और किसानों को मुफ्त बांटी गई किट

अच्छी पैदावार के लिए बिजाई के समय 100 किलो सिंगल सुपरफास्फेट और 15 किलो यूरिया (या 35 किलो डीएपी) प्रति एकड़ डालनी चाहिए। खेत की उर्वरक शक्ति बनाए रखने के लिए हर 2-3 साल में गोबर की खाद डालना भी जरूरी है। मुख्य अतिथि डॉ. मदन सिंह ने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने और 'मेरी फसल मेरा ब्यौरा' के लिए समय पर संपर्क करने की अपील की। कार्यक्रम के दौरान हिन्दुस्तान गम एंड कैमिकल्स भिवानी की तरफ से 78 किसानों को दो एकड़ के लिए बीज उपचार की वेबिस्टिन दवाई, एक मास्क और दस्ताने मुफ्त दिए गए। शिविर में राजेंद्र सिंह, रजनीश, कृष्ण, संदीप, सुखदेव, जयप्रकाश, भीमसिंह, रामसिंह और अशोक समेत कई किसान मौजूद रहे।
 

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