https://www.choptaplus.in/

Sociology of religion: दुर्खीम एवं प्रकार्यवाद (Durkheim and Functionalism) का वर्णन करें।

समाज में एकता की स्थापना के पीछे धर्म को देखकर दुर्खीम ने धनं का सामुदायिक विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान माना।

 
दुर्खीम एवं प्रकार्यवाद
प्रकार्यवाद में सामाजिक संरचना के अंतर्गत वैयक्तिक अथवा जैविक आवश्यकता संबंधी अध्ययन को महत्त्व दिया जाता है

  

Chopta plus:    दुर्खीम 19वीं शताब्दी के बाद के तथा 20 वीं शताब्दी के आरंभ के समय के फ्रांस के एक प्रमुख समाजशास्त्री थे। समाज में एकता की स्थापना के पीछे धर्म को देखकर दुर्खीम ने धनं का सामुदायिक विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान माना।

साथ ही दुर्खीम ने धर्म को मानव और समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा-समझा और इसे एक सामूहिक घटना करार दिया। उनके लिए धर्म एक सामूहिक घटना है तथा वह समूह ही है जो धर्म को उसका विशिष्ट लक्षण तथा एकता प्रदान करता है।

दूसरी ओर धर्म समूह को एक करता है तथा लोगों को एक साथ जोड़ता है। इस प्रकार निष्कर्ष रूप में वे कहते हैं कि धार्मिक विचार समाज से बनते हैं तथा समाज के सदस्यों को आपस में जोड़ने का कार्य करते हैं।

दुर्खीम ने संरचनात्मक प्रकार्यवाद को प्रोषित किया तथा अपने विश्लेषण का आधार बनाया, प्रकार्यवाद में सामाजिक संरचना के अंतर्गत वैयक्तिक अथवा जैविक आवश्यकता संबंधी अध्ययन को महत्त्व दिया जाता है, किंतु संरचनात्मक प्रकार्यवाद में सामाजिक एकता को बल दिया जाता है, दुर्खीम ने न्यूनवादी कथनों को नकार दिया तथा सामाजिक तथ्यों, संरचनाओं, प्रतिमानों तथा मूल्यों के अध्ययन पर ज्यादा ध्यान दिया।

 यह इकाई इसका वर्णन करेगी कि उन्होंने धर्म के समाजशास्त्रीय सिद्धांत का विकास कैसे किया। दूरखींम   ने धर्म के संबंध में उसके प्रकार्य के बारे में एकता सबंधी बात कही है, जिसे वे अनिवार्य व सकारात्मक प्रकार्य कहते हैं। अतः इस इकाई में दुर्खीम के प्रकार्यवाद, टोटमवाद एवं पवित्र अपवित्र के बीच भेद की चर्चा की गई है।

Rajasthan