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Sociology of religion : भगवान श्री कृष्ण के संबंध में श्रील के विचारों का उल्लेख करें ।

श्रीकृष्ण की भक्त्ति रागानुगा भक्ति है जिसमें कृष्ण की मनोहर छवि का स्मरण कर उसे आत्मसात किया जाता है।
 
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ब्रह्मा परम सत्य है और बह्या कृष्ण के शरीर की आमा है।

 Sociology of religion :    भगवान श्रीकृष्ण की आराधना में नृत्य और गीत की प्रधानता जयदेव गीतगोविंद और विद्यापति की पदावलियों में बृहत स्तर पर देखने को मिलती हैं। गीत की बा परपरा इस्कॉन सम्प्रदाय में भी विद्यमान है। सार्वजनिक रूप से भक्तगण मंत्रोच्चारण करते हैं। नृत्य-गीत में मग्न रहते हैं।

श्रीकृष्ण की भक्त्ति रागानुगा भक्ति है जिसमें कृष्ण की मनोहर छवि का स्मरण कर उसे आत्मसात किया जाता है। इस्कॉन सम्प्रदाय इससे थोड़ा निन्न है। श्रील प्रभुपाद इसके महत्वपूर्ण भक्त रहे हैं वे भगवान श्रीकृष्ण को सर्वोच्च और परम सत्य मानते हुए भक्ति और गायन में लीन हो जाते हैं।


 Sociology of religion :   श्रील कृष्ण  कृष्ण की भक्ति के लिए मक्त के लिए मक्त के मन में उठने वाले प्रश्नों की चर्च करते हुए कहते हैं कि जब तक ईश्वर के प्रति व्यक्ति की चेतना संशय मुक्त नहीं हो जाती तब तक वह पूर्णरूप से भक्ति में लीन नहीं हो सकता। सर्वप्रथम प्रश्न उठता है कि कृष्ण कौन है तथा उनका मूल स्वरूप क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के बाद ही भक्त के अंदर भक्ति के प्रति इच्छा जाग्रत होगी और मस्तिष्क में वृद्ध भाव का समावेश होगा।


 Sociology of religion :    श्रील कृष्ण को माता-पिता तथा सर्वोच्च सत्ता के रूप में देखते हैं, किंतु वे कृष्ण के पुरुष ईश्वरत्व के लिए उसे पूर्णता प्रदान करने के लिए एक स्त्री ईश्वरत्व की आवश्यकता महसूस करते हैं। प्रकृति के साथ साहचर्य से उत्पन्न जिज्ञासा को शांत करते हुए प्रकृति को शक्ति मानते हैं जो मनुष्य का उद्‌गम स्थल है। 


 Sociology of religion :    साथ ही ब्रह्मा परम सत्य है और बह्या कृष्ण के शरीर की आमा है। कहने का तात्पर्य है कि श्रीकृष्ण बढ़ता से भी परे हैं ब्रह्मा तो श्रीकृष्ण का ही एक हिस्सा है. इसलिए श्रील कृष्ण को सर्वोच्च सत्ता मानते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को अविभाज्य. अनंत, अत्तीम, सत्य आदि के रूप में माना जाता है जोकि वैष्णव परंपरा के कृष्णोपासक कवियों से भिन्न है। झील कहते हैं कि भौतिक जगत के पंक में लिपटे मनुष्य कृष्ण की लीला को समझने में असमर्थ होते हैं। इसी कारण श्रीभागवतगीता में स्वयं कृष्ण ने अपने बारे में सत्प को उद्‌घाटित किया है।


 Sociology of religion :    फलतः श्रील ने श्रीकृष्ण की सर्वोच्चता को स्थापित किया है और इस संदर्भ में तर्क भी प्रस्तुत किया है। उन्होंने ब्रह्माण्ड और नक्षत्र की गति, पृथ्वी की वनस्पति, फूल, फल सबसे सबके नियामक विवेक को माना है तथा यह विवेक ही भगवान कृष्ण है।

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