8 साल की तपस्या और 4 बार की असफलता, फिर भी नहीं मानी हार, हरियाणा के यशवंत ने 391वीं रैंक लाकर रचा इतिहास
हरियाणा के चरखी दादरी के रहने वाले यशवंत सांगवान ने वो कर दिखाया है, जिसका सपना देश के लाखों युवा खुली आंखों से देखते हैं। लगातार 8 साल की कड़ी मेहनत और 4 असफलताओं के बाद, यशवंत ने अपने 5वें प्रयास में UPSC परीक्षा में 391वीं रैंक हासिल कर पूरे प्रदेश का नाम रोशन कर दिया है। तीसरे प्रयास में इंटरव्यू तक पहुंचकर भी जब बात नहीं बनी, तो वे टूटे नहीं बल्कि दोगुनी ताकत से बाउंस बैक किया। एक बिजनेसमैन पिता और हाउसवाइफ मां के इस बेटे ने साबित कर दिया है कि अगर मन में कुछ कर गुजरने की जिद हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।
फरीदाबाद से शुरू हुआ सफर
यशवंत की शुरुआती स्कूलिंग चरखी दादरी से ही पूरी हुई थी। लेकिन 12वीं तक की पढ़ाई के लिए वे फरीदाबाद शिफ्ट हो गए और वहां अपनी बुआ के पास रहकर पढ़ाई की। यहीं से उनके अंदर समाज के लिए कुछ बड़ा करने का विजन क्लियर हुआ।
देश में हर साल लगभग 10 से 12 लाख युवा UPSC का एग्जाम देते हैं, लेकिन सिलेक्शन सिर्फ चंद सौ लोगों का ही होता है। यशवंत जानते थे कि कंपटीशन बहुत टफ है, लेकिन उनका फोकस एकदम सॉलिड था। उन्होंने लगातार आठ सालों तक खुद को इस मुश्किल तैयारी में झोंके रखा।

जब इंटरव्यू में मिली हार
UPSC की जर्नी कभी भी आसान नहीं होती, और यशवंत के लिए भी ये एक रोलरकोस्टर राइड की तरह थी। सबसे बड़ा झटका उन्हें अपने तीसरे प्रयास में लगा था, जब वे प्रीलिम्स और मेंस क्लियर करके इंटरव्यू राउंड तक पहुंच गए थे। सबको लगा था कि सिलेक्शन पक्का है, लेकिन फाइनल लिस्ट में उनका नाम नहीं आया।
ये वो पल होता है जब अच्छे-अच्छे स्टूडेंट्स डिप्रेशन में चले जाते हैं या मैदान छोड़ देते हैं। लेकिन यशवंत ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा और अपनी 'नेवर गिव अप' वाली सोच के साथ दोबारा तैयारी शुरू की, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।
फैमिली का मिला फुल सपोर्ट
हर सफल इंसान के पीछे उसके परिवार का बहुत बड़ा हाथ होता है। यशवंत के पिता संजय सांगवान (कुकू) एक बिजनेसमैन हैं और उनकी मां सरोज देवी एक होममेकर हैं। यशवंत अपनी इस शानदार जीत का पूरा क्रेडिट अपने पैरेंट्स के गाइडेंस को ही देते हैं।
उनका कहना है कि फेलियर के वक्त जब भी वो डिमोटिवेट होते थे, उनके पैरेंट्स हमेशा एक पिलर की तरह उनके साथ खड़े रहे। मां सरोज देवी का कहना है कि उन्होंने हमेशा अपने बेटे को अच्छे संस्कार और फैसले लेने की आजादी दी। उन्होंने बाकी पैरेंट्स से भी अपील की है कि बच्चों पर प्रेशर डालने के बजाय उन्हें हमेशा सपोर्ट करें।
युवाओं के लिए खास मैसेज
आज के टाइम में जब यूथ बहुत जल्दी हार मान लेता है, यशवंत की ये स्टोरी एक तगड़ा मोटिवेशन है। यशवंत का साफ कहना है कि अगर आप अपना गोल डिसाइड करके उस पर लगातार मेहनत करते हैं, तो सक्सेस मिलना 100% तय है। शॉर्टकट्स से कभी भी परमानेंट सक्सेस नहीं मिलती।
अब 391वीं रैंक के साथ सिलेक्ट होने के बाद यशवंत का विजन एकदम क्लियर है। वो देश और समाज के लिए ऐसे फैसले लेना चाहते हैं जिनका सीधा फायदा आम जनता को मिले।
निष्कर्ष: यशवंत सांगवान की ये जर्नी हर उस स्टूडेंट के लिए एक मास्टरक्लास है जो किसी भी बड़े एग्जाम की तैयारी कर रहा है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि फेलियर आपकी मंजिल नहीं है, बल्कि वो सक्सेस की तरफ जाने वाली सीढ़ी का एक स्टेप है। बस आपको मैदान में डटे रहना है। क्या आप भी किसी ऐसे एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं जिसमें आपको मोटिवेशन की जरूरत है? अपनी जर्नी शुरू करने के लिए आज ही अपना गोल फिक्स करें!
