https://www.choptaplus.in/

नौनन्द गांव की बेटी खुशी सिंधु: मेहनत, संघर्ष और सपनों की सुनहरी कहानी

करतार सिंह ने कभी अपनी आर्थिक स्थिति को बेटी की राह में बाधा नहीं बनने दिया
 
rohtak
सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए गोल्ड मेडल

हरियाणा के रोहतक जिले का छोटा सा गांव नौनन्द आज गर्व से अपना सिर ऊंचा किए हुए है। वजह है गांव की बेटी खुशी सिंधु, जिसने सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए गोल्ड मेडल जीतकर न सिर्फ अपने परिवार, बल्कि पूरे गांव और जिले का नाम रोशन किया है। खुशी की यह सफलता केवल एक पदक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की कहानी है, जो हर साधारण परिवार की असाधारण बेटियों को प्रेरणा देती है। खुशी सिंधु के पिता करतार सिंह किराए का ऑटो चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। सीमित आय, रोजमर्रा की जिम्मेदारियां और भविष्य की चिंताओं के बीच अपने बच्चों के सपनों को जिंदा रखना आसान नहीं होता। लेकिन करतार सिंह ने कभी अपनी आर्थिक स्थिति को बेटी की राह में बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।

खुशी बचपन से ही खेलों में रुचि रखती थी। स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में उसकी सक्रियता धीरे-धीरे कुश्ती के प्रति गंभीर लगाव में बदल गई। रोहतक के डीएवी स्कूल की 12वीं कक्षा की छात्रा खुशी ने पढ़ाई और खेल—दोनों को समान महत्व दिया। सुबह स्कूल, फिर स्टेडियम में कड़ी प्रैक्टिस और रात को पढ़ाई—यही उसकी दिनचर्या बन गई। कई बार थकान होती थी, संसाधनों की कमी खलती थी, लेकिन उसने कभी हार मानने का विचार तक नहीं किया।

10 से 12 जनवरी तक नोएडा में आयोजित अंडर-19 डीएवी राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता खुशी के करियर का अहम मोड़ साबित हुई। 65 किलोग्राम भार वर्ग में देशभर से आई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के बीच उतरना आसान नहीं था। हर मुकाबला कड़ी मेहनत, रणनीति और मानसिक मजबूती की परीक्षा था। फाइनल मुकाबले में खुशी का सामना झारखंड की मजबूत खिलाड़ी से हुआ। पूरे आत्मविश्वास और तकनीकी कुशलता के साथ खुशी ने मुकाबला अपने नाम किया और गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।

इस जीत के बाद खुशी का कहना है कि उसकी सफलता में सिर्फ उसकी मेहनत ही नहीं, बल्कि परिवार, कोच, स्कूल और गांव का सहयोग भी शामिल है। आर्थिक स्थिति भले ही मजबूत न हो, लेकिन अपनों का विश्वास और समर्थन उसे हर दिन आगे बढ़ने की ताकत देता है। वह नियमित रूप से स्टेडियम जाती है, कठिन अभ्यास करती है और खुद को हर दिन पहले से बेहतर बनाने की कोशिश करती है।

खुशी के कोच मनदीप का मानना है कि “पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं।” उनकी नजर में खुशी की परफॉर्मेंस और अनुशासन यह संकेत देता है कि वह भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश का प्रतिनिधित्व कर सकती है। कोच के अनुसार, खुशी न सिर्फ शारीरिक रूप से मजबूत है, बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद संतुलित और लक्ष्य के प्रति समर्पित है—जो किसी भी बड़े खिलाड़ी की पहचान होती है।

गोल्ड मेडल जीतने की खबर जैसे ही नौनन्द गांव पहुंची, पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। परिवार में मिठाइयां बंटी, स्कूल में सम्मान समारोह हुआ और गांव के लोग गर्व से खुशी की मिसाल देने लगे। आज खुशी केवल एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि गांव की बेटियों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का प्रतीक बन चुकी है।

खुशी सिंधु की कहानी यह साबित करती है कि सपनों को पूरा करने के लिए धन से ज्यादा जरूरी होता है—हौसला, मेहनत और सही मार्गदर्शन। वह उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं। खुशी ने दिखा दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो किराए के ऑटो चलाने वाले पिता की बेटी भी राष्ट्रीय मंच पर गोल्ड जीत सकती है।

आज खुशी का सपना सिर्फ पदक जीतना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए खेलना और तिरंगे को ऊंचा उठाना है। उसके बढ़ते कदम यह संकेत दे रहे हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब नौनन्द गांव की यह बेटी विश्व मंच पर भारत का नाम रोशन करेगी।
 

Rajasthan