टी. एस. इलियट के निवैयक्तिकता के सिद्धान्त को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इलियट का निवैयक्तिकता का सिद्धान्त उनका मौलिक चिन्तन है। उन्होंने अनेकताको एकता में बांधने के लिए परम्परा का योग स्वीकार किया, जिसके कारण साहित्य में आत्मनिष्ठ तत्त्व नियंत्रित हो जाते हैं और वस्तुनिष्ठ तत्त्व प्रमुख हो जाते हैं।
इलियट ने वस्तुनिष्ठ साहित्य को महत्त्व दिया और कला को निवैयक्तिक घोषित किया। कवि काव्य का माध्यम मात्र है। कवि व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति नहीं करता है वरन् वह विशिष्ट माध्यम मात्र है। व्यक्तिगत भावों की अभिव्यक्ति कला नहीं है, वरन् उनसे पलायन कला है। कलाकार की प्रगति निरन्तर आत्मा त्याग, व्यक्तित्व का निरन्तर बहिष्कार है।
इलियट ने अपने प्रारम्भिक वक्तव्यों में कहा था कि कवि कविता लिखता नहीं, अपितु कविता स्वयं कवि के माध्यम से कागज पर शब्द-विधान के रूप में उतर जाती है। इलियट के ये विचार बाद में इसी रूप में नहीं रहे। वे उतने निवैयक्तिक न रहे।
इस शिकायत का उत्तर इलियट ने दिया- "निर्वैयक्तिकता के दो रूप होते हैं। एक वह जो "कुशल शिल्पी मात्र" के लिए प्राकृतिक होती है। दूसरी वह जो प्रौढ़ कलाकूप के द्वारा अधिकाधिक उपलब्ध की जाती है। दूसरे प्रकार की निवैयक्तिकता उस प्रौढ़ कवि की होती है जो अपने उत्कृष्ट और व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सामान्य सत्य को व्यक्त करने में समर्थ होता है।"
इलियट स्वीकार करते हैं कि कवि और कलाकृति दोनों परस्पर प्रभावित होते हैं। इस परस्पर प्रभाव डालने से समस्त काव्यकृति कवि के व्यक्तित्व से निर्मित हो उठती है। वह कहता है- "मैं विश्वास करता है कि कवि अपने पात्रों को अपना कुछ अंश अवश्य प्रदान करता है, किन्तु में यह भी विश्वास करता हूँ कि वह अपने निर्मित पात्रों द्वारा स्वयं प्रभावित होता है।"
इससे तो यह स्पष्ट होता ही है कि वह कविता में कवि के व्यक्तित्व को अस्वीकार नहीं करता। इलियट ने काव्य के तीन स्वर माने हैं। एक स्वर में कवि स्वयं से बात करता है, दूसरे में श्रोताओं या पाठकों से और तीसरे में वह पात्रों के माध्यम से बात करता है।