लोन्जाइनस के उदात्त सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए और उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- लॉजाइनस ने 'उदात्त' को स्पष्ट तथ्य मानकर उसको परिभाषित नहीं किया। अलंकारों का निरूपण है। आगे के अध्यायों में शब्द, रूपक, बिम्ब, रचना की भव्यता का वर्णन है।
वह साहित्य के सब गुणों में उदात्तता को महान मानता है। यह वह गुण है जो अन्य क्षुद्र त्रुटियों के होते हुये भी माहित्य को प्रभावपूर्ण बनाता है। उदात्त के स्वरूप को प्रकट करते हुये लोंजाइनस कहते हैं- "उदात्त अभिव्यंजना का अनिर्वचनीय प्रकर्ष और वैशिष्ट्य है।" इसी साधन से साहित्यकारों और इतिहासकारों ने कीर्ति प्राप्त की।
उदात्त का प्रभाव श्रोताओं के अनुकार्यों पर नहीं, सम्मोहन में दृष्टिगोचर होता है। जो हमें विस्मित करके सम्मोहित करता है, वह मनोरंजन करने वाले साहित्य से श्रेष्ठ होता है। उदात्त तो प्रत्येक श्रोता को अपने सम्मोहन में बंधने के लिए विवश कर देता है। उदात्त की विशेषताएँ इस प्रकार प्रकट की जा सकती हैं-
(1) उदात्त अभिव्यंजना का प्रकर्ष और वैशिष्ट्य है।
(2) उदात्त का कार्य अनुकार्य करना नहीं, सम्मोहन है।
(3) उदात्त यदाकदा नहीं, अपितु सदा सर्वदा सबको सम्मोहित करता है।
(4) उदात्त रचनात्मक कौशल से भिन्न तत्त्व है। उसका प्रभाव क्रमिक नहीं, आकस्मिक होता है और उसके अलौकिक आलोक से कथ्य चमक उठता है।
लोंजाइनस ने 'उंदात्त' का व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक दोष के प्रकार से विवेचन किया। उन्होंने उदात्त के विवेचन में उसके अंतरंग और बहिरंग तत्त्वों पर विचार किया और 5 बातों को आवश्यक ठहराया-
(क) महान धारणाओं की क्षमता या विषय की गरिमा।
(ख) भावावेश की तीव्रता
ये दोनों जन्मजात हैं, अतः उदात्त के अन्तरंग पक्ष के अन्तर्गत आते हैं।
(ग) समुचित अलंकार-योजना
(घ) उत्कृष्ट भाषा।