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भूमंडलीकरण के कारण क्या भारत की सामाजिक संरचना में बदलाव आया हैं?

शहरी मध्यवर्ग, अनिवासी भारतीय, कृषि पूँजीपति और अधिकारी तंत्र, व्यावसायिक वर्गों/बुद्धिजीवी वर्ग के भीतर घटक।
 
हिंदी साहित्य
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारत आयात इतिस्थापन और अंतरोन्मुखी बाजार अर्थव्यवस्था की नीति अपनाता रहा है।

 Chopta plus: समाज में संरचनात्मक परिवर्तनों पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव आमतौर पर आर्थिक नीतियाँ में परिवर्तनों के माध्यम से आता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारत आयात इतिस्थापन और अंतरोन्मुखी बाजार अर्थव्यवस्था की नीति अपनाता रहा है।

इस नीति ने विश्व प्रतिस्पर्धा में विनिर्माण क्षेत्र में और निर्यात योग्य जिन्स उत्पादन में अर्थव्यवस्था को पंगु कर दिया। परंतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में उच्च शिक्षा तथा कृषिगत आधारभूत कैंचों पर उसके ध्यान दिए जाने से क्षतिपूर्ति हो गई। यह बात कृषि में 'हरित क्रांति' में, सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में हमारी बढ़ती शक्ति में, व्यवसायों में, बढ़ते मध्यवर्गों में और अंतरिक्ष अनुसंधान में देखी जा सकती है जिसने दूरभाष, दूरदर्शन एवं जनसंचार में एक नया आयाम जोड़ा है।

साथ ही. इस्पात, पैट्रोरसायन, बिजली आदि जैसे पूँजी साधित क्षेत्रों में निवेश ने एक आर्थिक एवं प्रौद्योगिक प्रयोज्य क्षमता को जन्म दिया है जो कि भूमण्डलीकरण की समकालीन चुनौतियों का सामना करने में पर्याप्त रूप से कारगर है। हमारे समाज की वर्तमान आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समुत्थान शक्ति ने काफी हद तक उभरते मध्य वर्ग को प्रभावित किया है।

अनुमान है कि सन् 2020 तक भारत की आधी जनसंख्या मध्यवर्गीय होगी, वो भी आर्थिक विकास की वर्तमान दर से इसके बावजूद, नब्बे के दशकारंभ में भारत द्वारा महसूस की गई भूमण्डलीकरण की चुनौतियों ने इन नीतियों को बदल डालना अपरिहार्य बना दिया। वास्तव में, आर्थिक उदारीकरण से जुड़े विषयों पर मतभेद अभी बने हुए हैं।

पटनायक व अन्य आर्थिक एवं सामाजिक मामलों में राष्ट्र संचालन एवं नियंत्रण नीति से एक नवोदार आर्थिक समिति की ओर खिसकाव का विश्लेषण करते हैं जो कि भारत में 1991 से ही होता रहा है।

बाहरी दबाव के संबंध में वे कुछ मूल परिवर्तनों का संदर्भ देते हैं जिनसे विश्व-पूँजीवाद गुजरा है और जिसके साथ हुआ है अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूँजी के एक नए रूप का उदय जो नवोदारवाद के विश्वव्यापी प्रोत्साहन को अपने हितों की पूर्ति करने वालों के रूप में देखता है। वे भारत में सुधारों के घरेलू सामाजिक समर्थन आधार को स्पष्ट करते हैं।

 भारतीय पूँजीपति वर्ग, उच्च वर्ग/जाति, शहरी मध्यवर्ग, अनिवासी भारतीय, कृषि पूँजीपति और अधिकारी तंत्र, व्यावसायिक वर्गों/बुद्धिजीवी वर्ग के भीतर घटक। समाज के ये वर्ग सुधारों के समर्थक और लाभग्राही है। इसके अतिरिक्त, सुधारों के घरेलू समर्थकों से जुड़े हित सुधारों की कोश-बैंक अन्विति योजना से भली-भाँति मेल खाते है जो कि मूल रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्वीकृत वित्त से जुड़े हितों की पूर्ति करते हैं।

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