हिंदी साहित्य: शास्त्रीय अथवा सैद्धान्तिक आलोचना का वर्णन करें।

Chopta plus: शास्त्रीय अथवा सैद्धान्तिक समीक्षा साहित्य के सिद्ध पक्ष पर विचार करती है। साहित्य का सैद्धान्तिक पक्ष ही उसका पक्ष है। रस, ध्वनि, रीति, वक्रोक्ति आदि से सम्बन्धित सम्प्रदाय तथा अनुकृति, अभिव्यंजना आदि के सिद्धान्त जो अपने स्वतंत्र तथा स्थिर रूप ग्रहण कर चुके है, शास्त्रीय तथा सैद्धान्तिक समीक्षा की सीमा में आते हैं।
नाटक, उपन्यास आदि अनेक साहित्य-विधाओं की रचना-रीति एवं साहित्य-उपादान तथा उपकरणों का पारिभाषिक विवेचन भी सैद्धान्तिक आलोचना के भीतर ही आते हैं।
सैद्धान्तिक आलोचना को ही शास्त्रीय आलोचना भी कहा जाता है। संस्कृत के आचायों ने साहित्यशास्त्र का जो विवेचन किया है तथा हिन्दी के रीतिकालीन कवियों ने साहित्यिक विषयों के जो लक्षण प्रस्तुत किये हैं वे सब शास्त्रीय आलोचना के ही अंग हैं।
रीति काल के पश्चात् हिन्दी साहित्य में शास्त्रीय आलोचना एक सिद्ध सामान्य कसौटी के रूप में मान्य रही है। किन्तु हिन्दी साहित्य में अपने निजी विकास में जो ऐतिहासिक मोड़ प्राप्त किये हैं, उनमें उसके जीवन-दर्शन, पद्धति आदि की विवेचना स्वतंत्र ढंग से की गई है, जिसे शास्त्रीय आलोचना से अलग शुद्ध सैद्धान्तिक आलोचना के रूप में जाना जाता है।
हिन्दी के छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, आदर्शवाद, यथार्थवाद, मानवतावाद, प्रकृतिवाद जैसे सिद्धान्तवादों की व्याख्या इसी सैद्धान्तिक आलोचना के उदाहरण हैं। इस प्रकार सैद्धान्तिक आलोचना की दो धाराएँ हैं, जिन्हें शास्त्रीय आलोचना और शुद्ध सैद्धान्तिक आलोचना कहा जा सकता है।