हिंदी साहित्य :सरस्वती' और महावीर प्रसाद द्विवेदी की भूमिका।

आचार्य द्विवेदी ने एक सच्चे अर्थों में सरस्वती' पत्रिका के सम्पादन से युग –निर्माता का कवि आरभं किया । जब इसका प्रकाशन सन् 1900 ई० में हुआ, तब इसके सम्पादक थे श्यामसुन्दर दास, कार्तिक प्रसाद खत्री , राधाकृष्ण , जगनाथ दास या किशोरीलाल गौस्यामी। 'सरस्वती' पत्रिका का सम्पादन महावीर प्रसाद दीवेदी ने सन् 1903 से लेकर सन् 1920 ई. तक किया ।
इस कालखंड में इस पत्रिका में प्रकाशित सामग्रियों की भाषा भाव और विचारों को द्विवेदी ने सुधारकर और नियंत्रण करके प्रकाशित किया । उन्होंने भाषा को प्रसाद गुण से युक्त व्याकरण सम्बन्धी आशुद्धियों से दूर शक्ति से पूर्ण बनाने का प्रयास किया ।
उन्होंने शब्दाडबर के साथ अश्लील और अधर्म ग्राम्य शब्दों के प्रयोगों से बचने का भी सुझाव दिया । उन्होंने देशज शब्द प्रयोग पर बल दिया । मुहावरों और स्वाभाविक अलकारों के प्रयोग के लिए प्रेरित किया ।
'सरस्वती' में प्रकाशित होने अथवा प्रकाशित न होने वाले इस युग के सभी रचनाकार समान रूप से प्रभावित नहीं थे । कुछ तो प्रत्यक्ष रूप से और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से अप्रभावित थे ।
द्विवेदीजी का साहित्यिक आदर्श - द्विवेदीजी का साहित्यिक आदर्श बहुत ऊंचा था । वे साहित्य के माध्यम से
लोगों की रुचि का परिष्कार करना चाहते थे-
"वह लोगों की रुचि का विचार रखकर अपनी कविता ऐसी सहज और मनोहर रचे कि साधारण पढे –लिखे लोगों में भी पुरानी कविता
के साथ-साथ नयी कविता पढ़ने का अनुराग उत्पन्न हो जाए। पढ़ने वालों के मन में नई –नई उपमाओं को नए –नए शब्दों को और नए –नए बिचारों को समझने की योग्यता उत्पन्न करना कवि का ही धर्म हैं । जब लोगों का झुकाव होने लगे , तब समय –समय पर कल्पित अथवा सत्य आख्यानों के द्वारा सामाजिक, नैतिक और धार्मिक विषयों की मनोहर शिक्षा दें ।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के विश्य में लिखा हैं -
"निवन्धों और समालोचनाओं द्वारा ये साहित्यिकों को निरतंर परेणणा देते रहे । द्विवेदी जी की समालोचनाओं ने जहां एक और तरुण साहित्यकारो को रूढ़िमुक्त होकर लिखने की प्रेरणा दी, दूसरी और कई कृति –साहित्यकारों को वाद –विवाद के क्षेत्र में उतरने और विचारों तेजक लेख लिखने का प्रोत्साहन दिया ।"