स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदायों की भूमिका का क्या योगदान हैं?

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा अनेक समुदायों के बलिदान और संघर्ष से जुड़ी हुई है। परंतु जब हम स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते हैं, तो सामान्यतः शहरी नेतृत्व, कांग्रेस के आंदोलन, और प्रमुख नेताओं की भूमिका पर ही ध्यान केंद्रित होता है। जनजातीय समुदायों के संघर्षों और बलिदानों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
वास्तव में, जनजातीय क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विरोध का स्वर प्रबल और लगातार था। यह लेख स्वतंत्रता संग्राम में जनजातियों की भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास करता है।
जनजातीय क्षेत्रों में ब्रिटिश शोषण की रणनीति
अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी में भारत पर अधिकार के साथ ही वनों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना आरंभ कर दिया। खासकर आदिवासी क्षेत्रों को वर्जित या अंशतः वर्जित क्षेत्रों के रूप में घोषित कर दिया गया। इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा की राजनीतिक चेतना से अलग-थलग रखना था।
1936 की फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह स्पष्ट किया कि वर्जित क्षेत्रों की नीति का असली उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों की संपत्ति और खनिज संसाधनों पर ब्रिटिश नियंत्रण को मजबूत करना तथा वहाँ के निवासियों का दमन करना था।
जनजातीय प्रतिरोध के स्वरूप
अनेक जनजातीय विद्रोहों ने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया। संथाल विद्रोह (1855), भील आंदोलन, कोल विद्रोह, खोंड विद्रोह, मुंडा आंदोलन (बिरसा मुंडा के नेतृत्व में), और ताना भगत आंदोलन जैसे अनेक जनजातीय संघर्ष स्वतःस्फूर्त रूप से उभरे और उन्होंने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अपने पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए युद्ध किया।
इन आंदोलनों की विशेषता थी कि यह स्थानीय संसाधनों, परंपराओं और अधिकारों की रक्षा के लिए थे। इन्हें संगठित राजनीतिक आंदोलनों की तरह न देखकर, कई बार "बगावत" या "विद्रोह" कहकर खारिज कर दिया गया।
आधुनिक प्रभावों और आत्मसातकरण की समस्या
ब्रिटिश शासन और बाद में शहरी भारतीय नेतृत्व, जनजातीय विरोध को उनकी अनुकूलन न कर पाने की अक्षमता के रूप में देखता रहा। उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने (assimilation) का प्रयास किया गया, लेकिन उनकी सांस्कृतिक पहचान, ज्ञान प्रणाली और जीवनशैली की अनदेखी की गई।
जवाहरलाल नेहरू ने भी 1952 में संसद में यह स्वीकार किया कि स्वतंत्रता आंदोलन का अनुभव जनजातीय समुदायों ने सीधा रूप में साझा नहीं किया, क्योंकि वे न केवल भौगोलिक रूप से अलग थे, बल्कि उन्हें सामाजिक रूप से भी बहिष्कृत किया गया था।
आदिवासियों का संघर्ष और योगदान
जहाँ एक ओर राजनीतिक नेतृत्व के लिए आदिवासी समाज "बाहरी" बना रहा, वहीं दूसरी ओर जनजातीय समाज ने स्वाभाविक रूप से स्वतंत्रता के विचार को आत्मसात किया और उसके लिए संघर्ष भी किया। उन्होंने अंग्रेजों के बनाए वन कानूनों और कर वसूली के विरुद्ध आवाज उठाई।
जनजातीय आंदोलन मुख्यतः अस्तित्व, संस्कृति और संसाधनों की रक्षा से जुड़ा हुआ था। अंग्रेजों के खिलाफ उनका संघर्ष भले ही पारंपरिक प्रतीकों और तरीकों से हुआ हो, परंतु उसका उद्देश्य स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय ही था।
कांग्रेस की दृष्टि और नीति
फैजपुर अधिवेशन के समय कांग्रेस ने यह महसूस किया कि आदिवासी समाज को अलग रखने की औपनिवेशिक नीति का प्रतिकार करना आवश्यक है। उसने स्पष्ट किया कि आदिवासियों के हितों की रक्षा आधुनिक प्रभावों के प्रति समझदारी भरे रुझान और संरक्षण नियमों के माध्यम से ही संभव है।
साथ ही, वन उत्पादों का औद्योगीकरण भी आदिवासी समाज की प्रगति के लिए आवश्यक माना गया।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदायों की भूमिका न तो सीमित थी और न ही नगण्य। भले ही उन्होंने संगठित राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा नहीं बने, लेकिन उनकी भूमि, संसाधनों और जीवनशैली की रक्षा हेतु लड़ा गया संघर्ष स्वतंत्रता के ही समान था।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इतिहास में उनके संघर्षों को उचित स्थान दिया जाए, और स्वतंत्रता आंदोलन की समावेशी व्याख्या की जाए जिसमें हर क्षेत्र और वर्ग का योगदान समाहित हो।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):
प्रश्न 1: स्वतंत्रता संग्राम में सबसे प्रसिद्ध जनजातीय आंदोलन कौन-सा था?
उत्तर: संथाल विद्रोह (1855) और बिरसा मुंडा द्वारा चलाया गया मुंडा आंदोलन सबसे प्रसिद्ध जनजातीय आंदोलन थे।
प्रश्न 2: जनजातीय समाज को स्वतंत्रता संग्राम से कैसे अलग रखा गया?
उत्तर: उन्हें राजनीतिक दृष्टि से 'वर्जित क्षेत्रों' में रखा गया, जिससे वे मुख्यधारा की राजनीतिक गतिविधियों से अलग रहे।
प्रश्न 3: क्या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जनजातियों की समस्याओं पर ध्यान दिया?
उत्तर: हाँ, 1936 के फैजपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने जनजातीय हितों की रक्षा और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की बात कही।
प्रश्न 4: क्या जनजातीय आंदोलनों को स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा माना जाना चाहिए?
उत्तर: अवश्य। वे स्वतंत्रता के मूल विचारों – आत्मनिर्णय, अधिकार और सम्मान – के लिए ही संघर्ष कर रहे थे।