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सामान्यों की संस्कृति क्या थी? विस्तार से वर्णन कीजिए।

परिवार या लोगों के समूह के पास उनके द्वारा किए गए कार्य के आधार पर उनकी पैदावार पर अधिकार होता है।
 
सामान्य का विचार मात्र संपत्ति
इस प्रणाली से पुनर्जीवन के लिए समय मिल जाता है।

 Choptaplus : सामान्य का विचार मात्र संपत्ति तक न सीमित होकर मन, शरीर और उससे सबंचित आत्मा की स्वतन्त्रताओं तक विस्तारित है। अंतरण खेती संपोष्य होती है क्योंकि यह प्राक्तिगत अधिकारी और सामूहिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में भूमि और वन के संबंध को परिभाषित करती है।

संक्षेप में, अंतरण खेती ऐसी प्रणाली है जिसमें फसलों को बारी-बारी से काटकर बन के भूखंडों को रिक्त छोड़ दिया जाता है जिससे वन पुनर्जीवित हो सके। इस प्रणाली के श्रेष्ठ उदाहरण में एक परिवार दो वर्ष में एक बार एक रिक्त स्थान से दूसरे पर चला जाता है और ऐसा कम से कम चौबीस रिक्त स्थानों पर किया जाता है।

इस प्रणाली का आंतरिक तर्क यह है कि किसी रिक्त स्थान पर एक वर्ष खेती करके उसे 48 वर्षों के लिए छोड़ दिया जाता है। इन 48 वर्षों में इस रिक्त स्थान पर पुनः वनारोपण हो जाता है। यहाँ यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि किसी भी समय पर अलग-अलग रिक्त स्थान पुनर्जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में होते हैं।

परिवार या लोगों के समूह के पास उनके द्वारा किए गए कार्य के आधार पर उनकी पैदावार पर अधिकार होता है। जब किसी रिक्त स्थान को खाली छोड़ दिया जाता है तो यह 'सामान्य' बन जाता है जहाँ से समूह के लोगों द्वारा ईंधन की लकड़ी, जड़े और अन्य वन उत्पाद लिए जा सकते है।

इस प्रणाली से पुनर्जीवन के लिए समय मिल जाता है। किसी खाली छोड़े गए रिक्त स्थान को सामान्य बनाने का एक कारण यह होता है कि वन का पुनरुद्धार सामूहिक उत्तरदायित्व है। दूसरे शब्दों में, भूमि पर किसी का कोई अधिकार नहीं होता है। केवल श्रम के उत्पाद के उपभोग का अधिकार होता है और उसके साथ सामान्यों के उपयोग को वन उत्पाद तक सीमित रखने और पुनर्जीवित होने देने का दायित्व भी होता है।

बस्तर, छत्तीसगढ़ में अबुझगढ़ के कोइटरों के बीच इस प्रणाली के पीछे वैश्विक दृष्टि यह होती है कि वन तलुरमु‌ट्टी का होता है। किसी आवासीय क्षेत्र की क्षेत्रीय सीमा वास्तव में उतनी ही होती है जितना किसी विशिष्ट तलुरमुट्टी का क्षेत्र होता है यानी, तलुरमुट्टी की सहमति के बिना आवासीय क्षेत्र के लिए रिक्ती बनाना संभव नहीं है।

कोइटरों का मानना है कि जहाँ ऐसा नहीं किया जाता, वहाँ शांति नहीं रहती, लोग बीमार हो जाते हैं, फसलें नहीं उगतीं और वनों में बाघ और साँप जैसे जानवर आवास में घुर्सकर प्रतिदिन के जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। इसके अतिरिक्त, तलुरमुट्टी के प्रति सभी कर्तव्यों को पूरा करके स्थिर सामाजिक जीवन जीया जा सकता है। इनमें नए खेती चक्र को आरंभ करने से पूर्व और नई फसल तथा आम, इमली जैसे फल खाने से पूर्व प्रसाद चढ़ाया जाता है। तलुरमुट्टी के साथ संबंधों में किसी प्रकार की अव्यवस्था, सामाजिक जीवन को खराब कर देती है।

कसेर गयाता की संस्था इस संबंध को निभाती है। किसी विशिष्ट वंश का कोई व्यक्ति कसेर गयाता कहलाता है। वह आवासीय क्षेत्र और तलमुट्टी की ओर से देख-रेख करता है।

 उसे आवास का पावन इतिहास पता होता है यहाँ सीमाओं के भीतर पावन स्थल बने होते हैचाह स्थान कार्य स्थान के आस-पास होते हैं। इन सभी पावन स्थलों में से, सबसे पवित्र वह स्थान है जहाँ तलुरगुट्टी का मंदिर स्थित है। यहाँ कोई गतिविधि नहीं की जा सकती।

वार्लियों में, किसान फसल को नष्ट करने वाले चूहों के लिए जहरीला खाना डालने से मना कर देता है किंतु फसल पर पहला अधिकार चूहे का होता है। वार्ली किसान कहता है जब कोई शेर या तेंदुआ झुंड में से किसी बकरी या भेड़ को ले जाता है तो बुजुर्ग कहते हैं. जो भी खाने योग्य है, खाया जाएगा जानवर भी भूखे होते हैं।

मूल्य सामान्यों के श्रम सिद्धात के अनुसार हम जगत के उस भाग में रहते हैं, जहाँ मानव श्रम का निवेश नहीं हुआ है। इसलिए मनुष्य उसका मालिक नहीं बन सकता। इसमें रुपूर्ण प्रकृक्ति मानव तथा गैर-मानव शामिल हैं। यह प्रकृति जगत 'प्रकृति की क्रिया' द्वारा बनाया गया है जो मनुष्य के कार्य या श्रम पर निर्भर नहीं करता है। कार्य करने के लिए प्रकृति में स्वचालित प्रणालियों के लिए आवश्यक समय और स्थान का मापक कई हजार वर्षों का होता है। इन प्रणालियों से प्रकृति की प्रचुरता तथा विषमता में रचनात्मक और सतत् रूप से सहयोग मिलता है। इसमें प्रकृति के पुनर्जीवन की क्षमता होती है।

औद्योगिक क्रांति के लगभग 400 वर्षों के इतिहास में हमने देखा है कि रचनात्मक स्व-नियंत्रित प्रणालियों के लिए समय और स्थान कम हो गया है जिसके कारण विभिन्नता तथा प्रचुरता अब असीमित और अपरिमित नहीं रह गई है। इससे न केवल प्रजातियों के जीवन बल्कि स्वयं जीवन की मूलभूत परिस्थितियों का ह्रास हुआ है। अपने अस्तित्व के विभिन्न स्तरों पर हम पुनरुद्धार तथा पुनर्जीवित होने की क्षमता के हास का सामना कर रहे हैं।

इस संकट से उबरने के लिए मनुष्य और प्रकृति के संबंध को प्रकृति के लिए अपनी रचनात्मक क्षमता को दोबारा प्राप्त करने के लिए आवश्यक स्थान और समय उपलब्ध करवाना पड़ेगा। समय और स्थान पर प्रकृति के अधिकार को पहचान कर तथा इन अधिकारों का उल्लघन न करने वाले अभिकल्पना तत्रों के उपयोग को स्वीकृति देकर, प्रकृति के इस कार्य को मनुष्य के कार्य से बचाया जा सकता है। वास्तव में, मनुष्यों को प्रकृति से केवल चेतना ही लेना चाहिए जितने से दूसरे लोगों को कमी न महसूस हो और प्रकृति को कार्य करने के लिए रचनात्मक प्रक्रियाओं के लिए स्थान और समय भी मिल सके।

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