पहचान में अनेकता पर टिप्पणी लिखिए।

Chopta plus: पहचान का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है। यिन्गर ने पहचान के इस जटिल निर्माण को निम्नलिखित कथन से स्पष्ट किया है यद्यपि कुछ पहचानों (छवियों) का आपस में टकराव होता है।
यदि एक पहचान मजबूत होती है तो दूसरी कमजोर पड़ जाती है तो दूसरी कमजोर पड़ जाती हैं और अन्य पहचान की समान संरचना में समायोजित हो जाती है। छोटी और अधिक अंतरंग पहचान के इर्द –गिर्द बड़ी और पराई पहचानों का घेरा होता है। परिवार, समुदाय, संजातीय समूह और समाज को पहचान के संकेंद्री वृत्तों के रूप में सोचिए। किसी समय कोई एक पहचान प्रमुख हो सकती हैं।
प्राथमिकताएँ बदलने पर पहचान भी बदल सकती है और समयक्रम की लय पर उनमें बदलाव आ सकता है (सांस्कृतिक नियमित अंतराल के साथ) और कभी- कभी संकटात्मक लय पर भी परिवर्तन हो सकता है (जिसका समय किसी घटना, संभवतः किसी संकट के साथ जिसका घटित होना निर्धारित नहीं किया जा सकता)।
मेहता ने अपने पत्र "एक अनेकात्मक समाज में पहचान की दुविधा: भारतीय नीति का अध्ययन में ठीक इसी प्रकार की बात कही है जिसमें 'मूल' और इर्द-गिर्द की पहचान का परीक्षण करने के लिए एक मामला तैयार किया गया जिसमें विभिन्न समुदायों के लोगों द्वारा अनुभव की गई अनेक पहचानों पर चर्चा की गई।
उसका विचार था भारतीय उप- महाद्वीप में बसे विभिन्न धर्म, संस्कृति और भाषायी विभिन्नताएँ भीड़ नहीं है अपितु वे सुनि निशिचत समुदाय हैं जिनसे प्रत्येक सदस्य अपनेपन की भावना रखता है। उनके अपने इतिहास है और अनेक अन्य अंत सामुदायिक समानताएँ हैं, जिनसे जुड़े होने की भावना इन समुदायों को आपस में जोड़े रखती है और इसे ही मूल पहचान कहते हैं। यह न हो सका।
समुदायों के सदस्य साधारणतया अपने इस जुड़ाव का आग्रह न करें और अभिव्यक्त न करें। यह केवल तनाव की स्थितियों में अथवा अपनी संजातीय पहचान को खतरे की स्थिति में ही हो सकता है कि वे अपने आपको अभिव्यक्त करें।
समाजशास्त्रीय सिद्धांत पहचान की इन प्रक्रियाओं पर एक दूसरे से घलने –मिलने की प्रक्रियाओं के दृष्टिगत विचार कर धारणाएँ बनाएँगे। स्टेन और हिल का अनुगमन करते हुए यिन्गर ने भी इसी प्रकार के विचार दिए है अलग-अलग समूहों के लोग अपने आपको एक ही समाज, एक नए समाज से जुड़ा हुआ सोच सकते है जो उनके मूल समाजों के साथ मिश्रित है। इस विचार के साथ 'दूसरों द्वारा पहचाना जाना' का तथ्य जुड़ा हुआ है जो एक समूह में स्वयं को पहचानने से अधिक नहीं तो उसके समान महत्त्वपूर्ण है।
सास्कृतिक मानव विज्ञानियों ने एकता की प्रक्रिया का साथ मिलने इकटठे होने तथा सांस्कृतिक सम्मिलन में बरसों तक भेद किया है। एकता का हमेशा यह अर्थ नहीं हो सकता है कि एक समूह एक दूसरे को स्वीकार करे ।
राजनीतिक दृष्टि से अथवा सख्या की दृष्टि से बलवती समूह अपने से छोटे समूह अथवा अल्पसंख्यकों को अपने में सम्मिलित करने से इंकार कर सकता है।
ठीक उसी समय एक छोटा समूह अपनी संजातीय मूल को छोड़कर बड़े समूह की पहचान का आग्रह कर सकता है। यह ठीक ही तर्क दिया गया है कि विविध पहचान रखने वाला व्यक्ति अपनी प्रमुख पहचान को व्यक्त करता है या तो दूसरों की अपेक्षाओं को देखकर अथवा अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर या फिर उस क्षण क्षण के हालात के आधार पर।
सामान्य भाव से कोई भी यिन्गर के साथ सहमत हो सकता है पहचान विरासत से ली जा सकती है, चुनी जा सकती है, स्वीकार की जा सकती है या किसी साक्ष्य के आधार पर वत की जा सकती है।
निस्बत भी इसी प्रकार का निम्नलिखित कथन के माध्यम से समर्थन करता है। पूरे लिखित इतिहास में प्रमुख राजनीतिक संस्थाओं से व्यक्तिगत निष्ठाओं के हस्तांतरण और नए के प्रकार के संजातीय, धार्मिक एवं अन्य समुदायों के उदय के बीच गहरा अंतर संबंध है जो इन राजनीतिक संस्थाओं के समक्ष चुनौतियों को एकदम त्याग देना है।
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