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अजीत डोभाल क्यों नहीं करते फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल? खुद किया बड़ा खुलासा

अजीत डोभाल क्यों नहीं करते फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल? खुद किया बड़ा खुलासा
 
ajit doval
अजीत डोभाल क्यों नहीं करते फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल? खुद किया बड़ा खुलासा

फोन और इंटरनेट से दूरी, युवाओं को दिया जिम्मेदारी और राष्ट्रवाद का संदेश

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का नाम देश की सुरक्षा नीति और रणनीतिक फैसलों के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है। उनकी कार्यशैली हमेशा से ही गोपनीयता, अनुशासन और स्पष्ट सोच पर आधारित रही है। हाल ही में एक सार्वजनिक संवाद के दौरान डोभाल ने अपनी जीवनशैली और काम करने के तरीके से जुड़ा एक अहम पक्ष साझा किया, जिसने युवाओं और नीति विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

डोभाल ने बताया कि वे आमतौर पर फोन और इंटरनेट जैसे डिजिटल माध्यमों से दूरी बनाए रखते हैं। उनका मानना है कि तकनीक जितनी उपयोगी है, उतनी ही संवेदनशील भी है, खासकर तब जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संवाद की हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे डिजिटल साधनों के पूरी तरह खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनका उपयोग बेहद सीमित और सोच-समझकर करते हैं।

संचार के वैकल्पिक और सुरक्षित तरीके

डोभाल के अनुसार, संवाद के केवल वही तरीके प्रभावी नहीं होते, जो आम लोगों को दिखते हैं। उन्होंने कहा कि संचार के कई ऐसे माध्यम भी होते हैं, जो सुरक्षित, नियंत्रित और परिस्थितियों के अनुसार ज्यादा भरोसेमंद होते हैं। ऐसे माध्यमों की जानकारी सार्वजनिक नहीं होती और न ही होनी चाहिए।

उनका यह दृष्टिकोण आज के साइबर युग में बेहद प्रासंगिक माना जा रहा है, जहां डेटा चोरी, साइबर जासूसी और डिजिटल निगरानी जैसे खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च सुरक्षा पदों पर बैठे व्यक्तियों का डिजिटल दुनिया से सीमित जुड़ाव रखना एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।

युवाओं से संवाद और विकसित भारत की सोच

एक युवा संवाद कार्यक्रम के दौरान डोभाल ने देश के युवाओं को राष्ट्र निर्माण का प्रमुख स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का सपना केवल योजनाओं और तकनीक से पूरा नहीं होगा, बल्कि इसके लिए जिम्मेदार, जागरूक और अनुशासित नागरिकों की आवश्यकता है।

उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे केवल अपने व्यक्तिगत लक्ष्य तक सीमित न रहें, बल्कि देश और समाज के लिए भी सोचें। डोभाल के अनुसार, नेतृत्व वही है जो कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की क्षमता रखता हो।

राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमा तक सीमित नहीं

डोभाल ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। समाज में शांति, आपसी विश्वास और सांस्कृतिक संतुलन बनाए रखना भी सुरक्षा का अहम हिस्सा है। यदि समाज अंदर से कमजोर होता है, तो बाहरी चुनौतियों का सामना करना मुश्किल हो जाता है।

इसी सोच के तहत उन्होंने देश में एकता, भाईचारे और आपसी सम्मान को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। उनका मानना है कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है, जिसे कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।

सूफी परंपरा और सांस्कृतिक एकता

इसी संदर्भ में, देश की सांस्कृतिक विरासत और सूफी परंपरा की भूमिका पर भी चर्चा हुई। सूफी विचारधारा को प्रेम, सहिष्णुता और मानवता का प्रतीक माना जाता है। इस परंपरा का उद्देश्य समाज को जोड़ना और कट्टर सोच से दूर रखना रहा है।

सूफी विद्वानों द्वारा चलाए जा रहे एक सांस्कृतिक अभियान की सराहना करते हुए यह कहा गया कि भारत की पहचान किसी एक धर्म या विचारधारा से नहीं, बल्कि उसकी साझा संस्कृति से बनती है। जब भारतीय विदेशों में जाते हैं, तो उन्हें उनकी धार्मिक पहचान से पहले भारतीय होने के आधार पर जाना जाता है।

कट्टरता के खिलाफ विचारों की लड़ाई

आज के समय में कट्टरता केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी लड़ी जाती है। समाज में फैलने वाली नफरत, गलत सूचनाएं और विभाजनकारी सोच को रोकने के लिए सकारात्मक संवाद और सांस्कृतिक जागरूकता जरूरी है।

डोभाल के विचारों का सार यही है कि मजबूत राष्ट्र वही होता है, जो अंदर से एकजुट और मानसिक रूप से सशक्त हो। इसके लिए सरकार, समाज और नागरिक—तीनों की समान भूमिका होती है।

तकनीक और विवेक का संतुलन

डिजिटल युग में तकनीक से पूरी तरह दूर रहना संभव नहीं है, लेकिन विवेक के साथ उसका उपयोग ही समझदारी है। डोभाल का दृष्टिकोण इसी संतुलन को दर्शाता है। वे तकनीक को साधन मानते हैं, लक्ष्य नहीं।

उनकी कार्यशैली यह संदेश देती है कि हर आधुनिक साधन जरूरी नहीं कि हर परिस्थिति में सही हो। सही समय, सही माध्यम और सही उद्देश्य—यही रणनीतिक सोच की पहचान है।

युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान

एनएसए अजीत डोभाल के विचार और कार्यशैली यह दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल हथियारों या तकनीक से नहीं, बल्कि सोच, संस्कृति और अनुशासन से भी जुड़ी होती है। फोन और इंटरनेट से दूरी रखने की उनकी आदत एक व्यक्तिगत निर्णय से कहीं अधिक, एक रणनीतिक संदेश है।

युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का उनका आह्वान और सांस्कृतिक एकता पर दिया गया जोर यह बताता है कि विकसित भारत की नींव केवल आर्थिक प्रगति पर नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना पर टिकी है।

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