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17वीं जाट रेजीमेंट का बहादुर सिपाही शहीद कृष्ण कुमार, जिसने कारगिल में दुश्मनों के छुड़ाए थे छक्के, गांव तरकांवाली वासियों को उनके शोर्य पर नाज

 
कारगिल युद्ध में शहीद हुए सिरसा के तरकांवाली गांव के सिपाही कृष्ण कुमार की तस्वीर

सिरसा। कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल की सबसे दुर्गम चोटी पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले सिरसा जिले के तरकांवाली गांव के बहादुर लाल सिपाही कृष्ण कुमार को आज भी पूरा देश और हरियाणा फख्र से याद करता है। भारतीय सेना की 17वीं जाट रेजीमेंट के इस वीर सिपाही ने 30 मई 1999 को अपनी बहादुरी का लोहा मनवाते हुए 8 पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था और मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।

शहादत के बाद टाइगर हिल पर भीषण गोलीबारी और भयंकर बर्फबारी के कारण भारतीय सेना तुरंत उनका पार्थिव शरीर बरामद नहीं कर पाई थी। पूरे 45 दिन तक इस वीर सपूत का शव कारगिल की बर्फीली चोटियों में दबा रहा। आखिरकार 45 दिन बाद जब सेना को उनका पार्थिव शरीर मिला, तो उसे लेकर जवान 16 जुलाई को उनके पैतृक गांव तरकांवाली पहुंचे। यहां हजारों नम आंखों और पूरे राजकीय सम्मान के साथ इस बहादुर बेटे का अंतिम संस्कार किया गया था।

देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले कृष्ण कुमार की शादी शहादत से ठीक एक साल पहले ही हुई थी। 27 मई 1998 को उनकी शादी पास के ही गांव जांडवाला बागड़ के रहने वाले ओमप्रकाश की बेटी संतोष के साथ हुई थी। सेना में भर्ती होने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग श्रीनगर में हुई थी और अपने अंतिम समय तक वे वहीं देश की सरहदों की रखवाली करते रहे।

बचपन से ही कृष्ण कुमार के दिल में देश प्रेम का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। जब वे पढ़ाई करने के लिए शाहपुरिया गांव के स्कूल में जाते थे, तो हमेशा दोस्तों से देशभक्ति और सेना की बातें किया करते थे। पढ़ाई में बेहद होशियार होने के साथ-साथ वे वॉलीबॉल के भी बेहतरीन खिलाड़ी थे। आज भी तरकांवाली और आसपास के गांवों के लोग उनके खेल और उनके हंसमुख स्वभाव को याद कर भावुक हो जाते हैं।

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